नक्सलवाद का ढलता सूरज: अब बंदूक नहीं, बेहतर जीवन है नया सपना

– फहीम खान पिछले कुछ महीनों से देश के अलग-अलग इलाकों, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र और ओडिशा से लगातार नक्सलियों के आत्मसमर्पण की खबरें आ रही हैं. 26 अक्टूबर को कांकेर में 21 माओवादी हथियार डालकर मुख्यधारा में लौटे, तो 17 अक्टूबर को 9.18 करोड़ रुपये के इनामी और सेंट्रल कमेटी के बड़े नेता रुपेश उर्फ सतीश ने समर्पण किया. अक्टूबर महीने में ही 300 से ज्यादा नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं. सवाल यही है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया कि कभी जंगलों में राज करने वाले ये लोग अब खुद पुलिस के सामने हथियार रख रहे हैं?
दरअसल अब वक्त बदल चुका है. जो आंदोलन कभी “ज़मीन उसी की जो जोते” के नारे से शुरू हुआ था, वो अब आदिवासियों की नई पीढ़ी के सपनों से मेल नहीं खा रहा. आज के नौजवान के लिए बंदूक नहीं, मोबाइल और मोटरसाइकिल अहम हैं. पहले जहां नक्सल इलाकों में स्कूल, सड़क और नेटवर्क तक नहीं थे, वहां अब शिक्षा, रोजगार और सरकारी योजनाएं पहुंच चुकी हैं. विकास की रोशनी ने “लाल गलियारे” को हरित दिशा में मोड़ दिया है. केंद्र सरकार ने भी 2026 तक नक्सलवाद खत्म करने का लक्ष्य तय किया है. आंकड़े बताते हैं कि 2010 के मुकाबले नक्सल हिंसा में 80% तक गिरावट आई है. “ऑपरेशन प्रहार”, “ऑपरेशन समन्वय” और “ऑपरेशन जंगल युद्ध” जैसे अभियानों ने माओवादियों की कमर तोड़ दी है. अब सिर्फ 8-9 जिलों में ही नक्सली सक्रिय हैं. पहले जहां सुरक्षा बल जंगल छोड़कर लौट आते थे, अब वे वहीं टिक गए हैं. सड़कें, पुल और मोबाइल टावर अब इन इलाकों की पहचान बन रहे हैं. सरकार की “बंदूक छोड़ो, जीवन पाओ” नीति ने भी असर दिखाया है. समर्पण करने वाले नक्सलियों को 5 लाख रुपये तक की आर्थिक मदद, मकान, सुरक्षा और नौकरी के मौके मिल रहे हैं. कई पूर्व नक्सली अब पंचायतों और सरकारी योजनाओं में काम कर रहे हैं. खास बात यह है कि आत्मसमर्पण करने वालों में बड़ी संख्या महिलाओं की है, जो अपने बच्चों का भविष्य बेहतर बनाने के लिए मुख्यधारा में लौट रही हैं.
कभी आदिवासी नक्सलियों को अपना रक्षक मानते थे, लेकिन अब वही उनसे दूर हो रहे हैं. गांवों में सड़कों, स्कूलों, आंगनबाड़ी और बैंक खातों के आने से लोगों को समझ आ गया है कि असली रास्ता विकास से होकर जाता है, न कि हिंसा से. बस्तर और दंतेवाड़ा जैसे इलाकों में अब मेले, खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रम फिर से शुरू हो गए हैं. ये दृश्य कभी सोचना भी मुश्किल था. सच तो यह है कि अब नक्सली संगठन अंदर से टूट चुके हैं. पुराने कमांडर या तो मारे गए या समर्पण कर चुके हैं. नए कैडर में वैचारिक दृढ़ता नहीं है, बस अस्तित्व बचाने की लड़ाई चल रही है. नेतृत्व संकट, आपसी मतभेद और पैसों की लड़ाई ने आंदोलन को खोखला कर दिया है.
हाँ, यह भी सही है कि कुछ जिलों में अभी भी माओवादी असर बाकी है, लेकिन अब उनकी ताकत स्थानीय स्तर तक सीमित रह गई है. आंदोलन के तौर पर नक्सलवाद अपने अंत की ओर बढ़ रहा है, हालांकि विचार के तौर पर वह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ. जब तक गरीबी, विस्थापन और असमानता जैसे मुद्दे रहेंगे, तब तक यह विचार किसी न किसी रूप में लौट सकता है. लेकिन आज की हकीकत यही है, जंगलों की खामोशी में अब गोलियों की गूंज नहीं, बल्कि नए जीवन की उम्मीदें सुनाई देने लगी हैं. बंदूक की जगह अब हल, मोबाइल और स्कूल की घंटी ने ले ली है. और शायद यही भारत के नक्सल प्रभावित इलाकों की नई पहचान बनने जा रही है, “लाल से हरित” की यात्रा का साक्षी नया भारत.

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