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मोहब्बत… जो खत्म नहीं होती

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वैलेंटाइन डे पर फहीम खान का ब्लॉग कई बार हम सुनते हैं- “अगर ये मोहब्बत शादी तक नहीं पहुंची तो सब बेकार गया.” और जब रिश्ता टूट जाता है तो वही लोग एक-दूसरे को बेवफा कहने लगते हैं. जैसे प्यार कोई सौदा था, जो पूरा नहीं हुआ तो घाटा हो गया. लेकिन सच पूछिए तो जिस दिन आपने किसी को बेवफा कहा, उसके एक दिन पहले तक वही शख्स आपकी धड़कनों में बसा हुआ था. सुबह की पहली याद, रात की आखिरी दुआ वही तो था. फिर अचानक क्या बदल गया? क्या वो इंसान बदल गया, या हमारे अंदर की उम्मीदें? मोहब्बत को हम अक्सर मंज़िल से जोड़ देते हैं, जबकि वो तो एक सफर है. हर सफर शादी तक पहुंचे, ये जरूरी नहीं. कुछ रिश्ते हमें सिर्फ बेहतर इंसान बनाने के लिए ही जिंदगी में आते हैं. याद है वो गुलाब? जो उसने हंसते हुए आपको दिया था. आपने उसकी पंखुड़ियां किताब के पन्नों में संभालकर रख दीं. सालों बाद जब वही किताब खुलती है और सूखी हुई पंखुड़ियां उंगलियों से छूती हैं, तो एक हल्की सी खुशबू फिर से दिल में उतर जाती है. वो शख्स सामने नहीं होता, लेकिन एहसास जिंदा हो जाता है. महान उर्दू शायर मिर्ज़ा ग़ालिब ने खूब कहा है- “इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये...

कांचन येले – जैसा यार, वैसी ही अनोखी कहानी

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- फहीम खान कांचन येले… नाम सुनते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। वजह साफ़ है — ये शख्सियत ही कुछ अलग है। पिताजी फौज से रिटायर्ड, लेकिन कांचन हमेशा से मनमौजी मिज़ाज के रहे। हंसमुख इतना कि कॉलेज में हर किसी के दिल में जगह बना ली थी। आईटीआई से इलेक्ट्रिशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब साहब नागभिड़ के कॉलेज में मराठी साहित्य पढ़ने पहुंचे, तो जेब में हमेशा एक छोटा एफएम रेडियो साथ होता। गाने सुनना और गाना — दोनों ही शौक के साथ निभाते थे, और खुदा ने गला भी कमाल का दिया था। लेकिन असली पहचान तो उस आदत से बनी, जिससे सब परेशान भी रहते और हैरान भी — हर इलेक्ट्रॉनिक चीज़ को खोलकर उसका 'पोस्टमार्टम' करना। यही आदत बाद में हुनर बनी और साहब गुवाहाटी, गुजरात, मुंबई होते हुए नागपुर के ले मेरेडियन होटल तक पहुंच गए। बीच में हल्दीराम और सयाजी जैसे नामी होटलों का भी हिस्सा बने। आज मेहनत और हुनर के दम पर जिंदगी को सजाने-संवारने में लगे हैं। कांचन की सबसे बड़ी खासियत यही है कि खुद चाहे कितने ही दर्द क्यों न झेल रहे हों, दूसरों को हमेशा हंसाते रहे। कॉलेज के दिनों में जब क्लास बंक करते, तो सबको पता...

एक तोता, एक बच्चा और नक्सलवाद की परछाई – भामरागढ़ की वो तस्वीरें जो आज भी धड़कनों में कैद हैं

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✍️ फहीम खान वर्ष 2001 से 2012 तक गढ़चिरोली में बिताया गया मेरा पत्रकारिता जीवन सिर्फ खबरों की तलाश नहीं, बल्कि इंसानियत के नजदीक पहुंचने का सफर था। चंद्रपुर में ‘महाविदर्भ’ और ‘दैनिक भास्कर’ जैसे अखबारों से होते हुए जब मुझे ‘नवभारत’ के जरिए गढ़चिरोली जाने का मौका मिला, तो मैंने उसे हाथ से जाने नहीं दिया। हालांकि नवभारत में मेरा प्रवास अल्पकालीन रहा, पर 'लोकमत समाचार' के जरिए इस ज़िले से जुड़ाव गहराता गया। गढ़चिरोली में जब मैं भामरागढ़ पहुंचा, तब नक्सलवाद अपने चरम पर था। पुलिस थाना और एसडीपीओ का बंगला शाम होते ही सूना हो जाता था। इन्हीं हालातों में एक दिन मैं उपविभागीय अधिकारी विजयकांत सागर के घर पहुंचा। वहीं पहली बार उनकी गोद में पल रहे मासूम रणवीर को देखा—पिंजरे के सामने बैठा हुआ, पिंजरे में बंद एक तोते को निहारता हुआ। उस क्षण ने मुझे झकझोर दिया। जैसे रणवीर और तोता दोनों ही किसी अदृश्य कैद में हों। नक्सल दहशत के कारण न स्कूल, न खेल- उसका बचपन जैसे छीन लिया गया हो। मेरे कैमरे ने वो दृश्य थाम लिया। 'झरोखा' कॉलम में जब वह फोटो छपी, तो विजयकांत सागर ने उसे संजो लिया। ...

मकाऊ की प्रेम-गली – ‘त्रावेसा दा पैशाओ’

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मकाऊ की सड़कों पर चलते हुए जब मैं रूइंस ऑफ सेंट पॉल्स की सीढ़ियां उतरने लगा, तो दाहिनी ओर एक छोटी-सी गली ने मेरा ध्यान खींचा. हल्के गुलाबी, पीले और नीले रंगों से रंगे पुराने पुर्तगाली शैली के मकान, फूलों से सजे गमले, और पत्थरों से बनी सीढ़ियां — यह कोई आम गली नहीं लग रही थी. नाम था त्रावेसा दा पैशाओ (Travessa da Paixão) यानी प्रेम की गली. जैसे ही मैं इस गली में आगे बढ़ा, लगा जैसे समय कुछ पल के लिए थम गया हो. वहां एक अलग ही शांति और सौंदर्य था, जो हर मोड़ पर एक नई कहानी कहता प्रतीत होता था. हर मकान की दीवारें जैसे किसी पुराने प्रेम-पत्र की तरह कुछ कहना चाहती थीं. यह जगह जितनी सुंदर थी, उतनी ही रहस्यमयी भी. गली में चलते-चलते एक छोटा-सा सिनेमा दिखा. उत्सुकतावश मैं अंदर चला गया. वहां प्रेम पर आधारित क्लासिक फिल्मों के पोस्टर लगे थे, और स्थानीय स्वतंत्र फिल्मों की स्क्रीनिंग चल रही थी. यह जानकर सुखद आश्चर्य हुआ कि इस सिनेमागृह में वे फिल्में दिखाई जाती हैं, जिन्हें आमतौर पर व्यावसायिक रूप से रिलीज होने का अवसर नहीं मिलता. बाद में पता चला कि इस गली का नाम पैशाओ (Paixão) यानी "प्रे...

एआई तकनीक: वर्तमान स्थिति और भविष्य की संभावनाएं

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by फहीम खान, जर्नलिस्ट, नागपुर.  आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की तकनीक ने हाल के वर्षों में बहुत प्रगति की है। आज, एआई हमारी रोजमर्रा की जिंदगी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। एआई के विभिन्न उपयोग जैसे कि वॉइस असिस्टेंट (जैसे कि सिरी और एलेक्सा), स्पैम फिल्टरिंग, पर्सनलाइज्ड कंटेंट रिकमेंडेशन, स्वचालित ड्राइविंग, और स्वास्थ्य देखभाल में बीमारी का निदान आदि ने इसे हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बना दिया है। एआई मशीन लर्निंग और डीप लर्निंग जैसे तकनीकों के माध्यम से लगातार सीख और विकसित हो रहा है, जिससे यह और भी स्मार्ट और उपयोगी होता जा रहा है। भविष्य में एआई की संभावनाएँ भविष्य में, एआई के कारगर साबित होने की संभावनाएँ अनगिनत हैं। चिकित्सा क्षेत्र में, एआई का उपयोग कैंसर जैसे गंभीर रोगों का प्रारंभिक चरण में पता लगाने और उपचार करने के लिए किया जा सकता है। शिक्षा में, यह छात्रों के लिए पर्सनलाइज्ड लर्निंग अनुभव प्रदान कर सकता है। एआई का उपयोग स्मार्ट सिटी और स्मार्ट घरों को विकसित करने के लिए भी किया जा सकता है, जो ऊर्जा बचाने और सुरक्षा में सुधार करने में मदद करेंगे। व्यवसायों के लि...