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शेयर मार्केट में कम रिस्क के साथ अच्छा रिटर्न कैसे पाएं

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सही पोर्टफोलियो बनाने की आसान गाइड  – फहीम खान   शेयर मार्केट में निवेश करना आज के समय में आम हो गया है, लेकिन कम रिस्क के साथ अच्छा रिटर्न पाना हर किसी की चाहत होती है. यह काम किस्मत से नहीं, बल्कि सोच-समझ, सही प्लानिंग और अनुशासन से होता है. अगर आप भी सुरक्षित तरीके से निवेश करना चाहते हैं, तो यह ब्लॉग आपके लिए है. 1. सबसे पहले अपना लक्ष्य तय करें निवेश शुरू करने से पहले खुद से एक सवाल जरूर पूछें—आप पैसा क्यों लगा रहे हैं. क्या आपको 3–5 साल में पैसा चाहिए या 10–15 साल बाद बच्चों की पढ़ाई, घर खरीदना या रिटायरमेंट जैसे लक्ष्य अलग-अलग होते हैं. याद रखें, लक्ष्य जितना लंबा होगा, उतना रिस्क संभालना आसान होगा.    2. सारे पैसे एक जगह न लगाएं कम रिस्क निवेश का सबसे बड़ा मंत्र है डायवर्सिफिकेशन, यानी पैसा अलग-अलग जगह लगाना. आप अपना पोर्टफोलियो इस तरह बांट सकते हैं: 40–50% मजबूत और भरोसेमंद शेयरों में 25–30% म्यूचुअल फंड या इंडेक्स फंड में 10–15% डेट फंड या एफडी में 5–10% गोल्ड या गोल्ड ETF में इससे अगर एक जगह नुकसान हो, तो दूसरी जगह से संतुलन बना रहता ह...

नक्सलवाद का ढलता सूरज: अब बंदूक नहीं, बेहतर जीवन है नया सपना

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– फहीम खान पिछले कुछ महीनों से देश के अलग-अलग इलाकों, छत्तीसगढ़, झारखंड, महाराष्ट्र और ओडिशा से लगातार नक्सलियों के आत्मसमर्पण की खबरें आ रही हैं. 26 अक्टूबर को कांकेर में 21 माओवादी हथियार डालकर मुख्यधारा में लौटे, तो 17 अक्टूबर को 9.18 करोड़ रुपये के इनामी और सेंट्रल कमेटी के बड़े नेता रुपेश उर्फ सतीश ने समर्पण किया. अक्टूबर महीने में ही 300 से ज्यादा नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं. सवाल यही है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया कि कभी जंगलों में राज करने वाले ये लोग अब खुद पुलिस के सामने हथियार रख रहे हैं? दरअसल अब वक्त बदल चुका है. जो आंदोलन कभी “ज़मीन उसी की जो जोते” के नारे से शुरू हुआ था, वो अब आदिवासियों की नई पीढ़ी के सपनों से मेल नहीं खा रहा. आज के नौजवान के लिए बंदूक नहीं, मोबाइल और मोटरसाइकिल अहम हैं. पहले जहां नक्सल इलाकों में स्कूल, सड़क और नेटवर्क तक नहीं थे, वहां अब शिक्षा, रोजगार और सरकारी योजनाएं पहुंच चुकी हैं. विकास की रोशनी ने “लाल गलियारे” को हरित दिशा में मोड़ दिया है. केंद्र सरकार ने भी 2026 तक नक्सलवाद खत्म करने का लक्ष्य तय किया है. आंकड़े बताते हैं कि 2010 के मुका...

मिग-21 : 2400 घंटे की उड़ान उम्र वाले जहाज ने भरी 4000 घंटों की उड़ान

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अलविदा ‘टाइगर’ : पार्ट-2 - वायुसेना के इंजीनियरों का कमाल, 20- 22 साल से बढ़ा दी विमान की उम्र रशिया ने जिस मिग-21 लड़ाकू विमान को 2400 घंटों की उड़ान या 40 साल उम्र बताकर भारत को बेचा था, उसी विमान की कार्यक्षमता को समय-समय पर बढ़ाकर भारतीय वायुसेना के इंजीनियरों ने करीबन 4000 घंटों की उड़ान भरी और इस विमान की उम्र 20-22 साल से बढ़ा दी. ऐसा कारनामा करने वाली दुनिया में भारत की ही एकमात्र वायुसेना और उसके इंजीनियर हैं. यह कहना है भारतीय वायुसेना के पूर्व अधिकारी एयर मार्शल हरीश मसंद का. वे लोकमत समाचार से मिग-21 की विदाई के अवसर पर बात कर रहे थे. उनका कहना है कि यदि भारतीय चाहें तो क्या कुछ कर गुजर सकते हैं, इसका प्रमाण ही मिग-21 विमान है. ऐसा इसलिए कि हमने मिग-21 को जब खरीदा तो धीरे-धीरे हमें उसमें कुछ कमिया नजर आईं. जैसे उसमें गन नहीं थी, अकेली मिसाइल थी. भारतीय वायुसेना के इंजीनियरों की तारीफ होनी चाहिए कि उसमें गोंडोला गन लगाई गई. भारत ने मिग-21 का जिस तरीके से इस्तेमाल किया है, वह कहीं पर भी रशिया द्वारा बनाए गए विमान के हिसाब से नहीं था. हमने काफी हद तक आगे बढ़कर इसका अल...

मिग-21 को काॅफिन कहकर नाइंसाफी की गई

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- वीर चक्र से सम्मानित एयर मार्शल हरीश मसंद से लोकमत समाचार की बातचीत अलविदा ‘टाइगर’ : पार्ट-1 मिग -21 जैसा लड़ाकू विमान भारतीय वायुसेना के बेड़े में हमेशा होना चाहिए. इस विमान ने वायुसेना के जांबाज फाइटर पायलटों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर दुश्मनों को धूल चटाई है. लेकिन बावजूद इसके मिग-21 को काॅफिन कहा गया. यह असल में इस विमान के साथ नाइंसाफी ही थी. जो ऐसा कहते थे उन्होंने कभी इसकी खूबियों को जानने की कोशिश नहीं की, और न ही उन्होंने कभी दूसरे विमानों के साथ तुलना में आंकड़े ही पेश किए. यह कहना है वीर चक्र से सम्मानित भारतीय वायुसेना के पूर्व अधिकारी एयर मार्शल हरीश मसंद का. एयर मार्शल मसंद ने कहा कि वे 67 कमिशन्ड अफसर हैं. उन्होंने वैसे तो जरा देरी से ही भारतीय वायुसेना के पहले सुपर सोनिक विमान मिग-21 को उड़ाना शुरू किया था लेकिन अपने सेवाकाल के दौरान उन्होंने लगातार पांच साल में करीबन 1003 घंटे की मिग-21 की उड़ान का अनुभव जरूर लिया है. भारतीय वायुसेना के अन्य लड़ाकू विमानों को भी उड़ाने का उन्हें अनुभव रहा, लेकिन उनका मानना है कि आसमान में जिस जाबांजी के साथ यह विमान अपने टार...

लाख टके की बात : ये सफर नहीं आसान, गड्ढों का दरिया है और उछलते जाना है...

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- फहीम खान नागपुर... हमारी उपराजधानी, संतरे के स्वाद जैसी मीठी पहचान वाला शहर… पर इन दिनों सड़कों की हालत कड़वे सच जैसी हो चली है. हर तरफ गड्ढे ही गड्ढे. कोई सड़क पूछिए, कोई इलाका चुनिए, जवाब में दर्द मिलेगा. और ये दर्द अब केवल वाहन के टायरों का नहीं, सीधे आम नागपुरवासी के शरीर और मन का है. हर सुबह जब कोई बाइक पर ऑफिस के लिए निकलता है या बच्चा स्कूल की बस में बैठता है, तो उनकी रीढ़, उनकी गर्दन, उनके कंधे इन झटकों को झेलने के लिए मजबूर होते हैं. डॉक्टर कहते हैं, रीढ़ की हड्डी शरीर का आधार है, और ये झटके उसी आधार को तोड़ने का काम कर रहे हैं. हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. सिद्धार्थ जगताप बताते हैं कि सड़क पर हर उछाल, हर गड्ढा रीढ़ पर दबाव बनाता है. नतीजा? कमर दर्द, गर्दन की अकड़न, कलाई का सूजना, और स्लीप डिस्क जैसी तकलीफें. बात यहीं खत्म नहीं होती. जब आंखें सड़क के हर गड्ढे को तलाशने में जुट जाएं, तो सिर दर्द और आंखों की थकान लाज़िमी हो जाती है. और जब शरीर थकने लगे, तो मन भी थक जाता है. जनरल फिजिशियन डॉ. पिनाक दंदे कहते हैं, हर रोज गड्ढों से जूझता ड्राइवर सिर्फ शारीरिक नहीं, मानसिक थकान भी...

लाख टके की बात : जहां फ्लाईओवर हैं, वहां समस्या क्यों है?

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– फहीम खान एक समय ऐसा था जब शहर में सिर्फ पांचपावली फ्लाईओवर था, तब लोग उसे देखकर हैरत में पड़ जाते थे. आज हालात ऐसे हैं कि नागपुर ‘फ्लाईओवरों का शहर’ बनता जा रहा है, लेकिन इन फ्लाईओवर की डिजाइन ऐसी उलझी हुई है कि जितनी राहत मिलनी चाहिए थी, उससे ज्यादा परेशानी और सवाल खड़े हो गए हैं. हैरानी इस बात की नहीं कि शहर में तेजी से एक के बाद एक फ्लाईओवर बनाए जा रहे हैं, बल्कि इस बात की है कि हर फ्लाईओवर की शुरुआत में ही कोई न कोई गड़बड़ी सामने आती है. कभी डिजाइन बदलना पड़ता है, कभी आर्म की दिशा, कभी स्पैन गिर जाता है, तो कहीं फ्लाईओवर धंस जाता है. सदर का रेसिडेंसी रोड फ्लाईओवर 15 साल पहले बन जाना चाहिए था. लेकिन पहले होटल के पास लैंडिंग रखी, फिर केपी ग्राउंड की ओर मोड़ा गया और आज करोड़ों की लागत से दोबारा आर्म बनाई जा रही है. मतलब शुरुआत की प्लानिंग इतनी कच्ची थी कि अब इसे सुधारने में दोगुना खर्च आ रहा है. क्या जनता के पैसों से ऐसे प्रयोग होते रहेंगे? अमरावती रोड के फ्लाईओवर की लंबाई पहले 2 किमी थी, बाद में इसे 500 मीटर बढ़ाया गया. बूटीबोरी फ्लाईओवर के धंसने की घटना को एक भारी ट्रक पर थोपना ...

लाख टके की बात : 102 साल के विश्वविद्यालय को आखिर क्यों नहीं मिल रहा कप्तान?

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- फहीम खान राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय की पहचान केवल एक शिक्षण संस्था के रूप में नहीं है, बल्कि यह मध्य भारत की शैक्षणिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक चेतना का केंद्र भी है. सन 1923 में स्थापित यह विश्वविद्यालय आज 100 वर्ष से अधिक का हो चुका है. लेकिन ऐसी प्रतिष्ठित संस्था में एक वर्ष से स्थायी कुलपति की गैरमौजूदगी शिक्षा व्यवस्था के लिए एक गहरी चिंता का विषय है. दिवंगत कुलपति डॉ. सुभाष चौधरी के निलंबन और बाद में असामयिक निधन के बाद से यह पद रिक्त पड़ा है. कभी डॉ. प्रशांत बोकारे को अस्थायी रूप से जिम्मेदारी दी गई, फिर यह कार्यभार प्रशासनिक अधिकारी माधवी खोड़े को सौंपा गया. लेकिन स्थायित्व नाम की चीज अब तक नदारद है. अब सोचिए, 500 से ज्यादा संबद्ध महाविद्यालय, 4 लाख से अधिक छात्र, दर्जनों विभाग और रिसर्च प्रोजेक्ट, और इन सबका कोई स्थायी कप्तान ही नहीं! यह कोई सामान्य लापरवाही नहीं, बल्कि एक सोची-समझी उदासीनता है. जब देश शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव की बात कर रहा है, नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू की जा रही है, विश्वविद्यालयों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बना...