सोशल मीडिया की दौड़ में खोती संवेदनशीलता
- फहीम खान एक समय था जब अपने विचारों को समाज तक पहुंचाने के लिए लोगों को चौपाल, बाजार, सभागार या सार्वजनिक मंचों का सहारा लेना पड़ता था. संवाद सीमित था, लेकिन उसमें जिम्मेदारी और संवेदनशीलता भी थी. आज डिजिटल क्रांति ने अभिव्यक्ति के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है. सोशल मीडिया के माध्यम से हर व्यक्ति के हाथ में एक ऐसा मंच आ गया है, जहां वह अपनी बात लाखों लोगों तक आसानी से पहुंचा सकता है. यह बदलाव लोकतंत्र को मजबूत करने वाला है, लेकिन इसके साथ कुछ गंभीर चुनौतियां भी सामने आई हैं. आज सोशल मीडिया केवल संवाद का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि लोकप्रियता का पैमाना बन चुका है. लाइक्स, व्यूज, शेयर और फॉलोअर्स की संख्या कई लोगों के लिए सफलता का मापदंड बन गई है. इस होड़ में कुछ लोग ऐसी सामग्री प्रस्तुत कर रहे हैं जो समाज में नकारात्मकता, असंवेदनशीलता और अपमानजनक प्रवृत्तियों को बढ़ावा देती है. मनोरंजन और हास्य के नाम पर व्यक्तियों, समुदायों और विशेष रूप से महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुंचाने वाली टिप्पणियां आम होती जा रही हैं. हाल ही में सामने आई एक घटना इस प्रवृत्ति का उदाहरण है. स्टैंड-अप कॉमेडियन ...