मोहब्बत… जो खत्म नहीं होती
वैलेंटाइन डे पर फहीम खान का ब्लॉग कई बार हम सुनते हैं- “अगर ये मोहब्बत शादी तक नहीं पहुंची तो सब बेकार गया.” और जब रिश्ता टूट जाता है तो वही लोग एक-दूसरे को बेवफा कहने लगते हैं. जैसे प्यार कोई सौदा था, जो पूरा नहीं हुआ तो घाटा हो गया. लेकिन सच पूछिए तो जिस दिन आपने किसी को बेवफा कहा, उसके एक दिन पहले तक वही शख्स आपकी धड़कनों में बसा हुआ था. सुबह की पहली याद, रात की आखिरी दुआ वही तो था. फिर अचानक क्या बदल गया? क्या वो इंसान बदल गया, या हमारे अंदर की उम्मीदें? मोहब्बत को हम अक्सर मंज़िल से जोड़ देते हैं, जबकि वो तो एक सफर है. हर सफर शादी तक पहुंचे, ये जरूरी नहीं. कुछ रिश्ते हमें सिर्फ बेहतर इंसान बनाने के लिए ही जिंदगी में आते हैं. याद है वो गुलाब? जो उसने हंसते हुए आपको दिया था. आपने उसकी पंखुड़ियां किताब के पन्नों में संभालकर रख दीं. सालों बाद जब वही किताब खुलती है और सूखी हुई पंखुड़ियां उंगलियों से छूती हैं, तो एक हल्की सी खुशबू फिर से दिल में उतर जाती है. वो शख्स सामने नहीं होता, लेकिन एहसास जिंदा हो जाता है. महान उर्दू शायर मिर्ज़ा ग़ालिब ने खूब कहा है- “इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये...