वाकई मुश्किल नहीं है, इंसान बने रहना?


- फहीम खान 

मेरे बचपन की कुछ यादें आज भी ताजा हैं. उन यादों में एक दूरदर्शन का विज्ञापन भी शामिल है. वह कोई चकाचौंध वाला विज्ञापन नहीं था, न ही उसमें बड़े सितारे थे. लेकिन उसमें एक सवाल था, जो सीधे दिल में उतर जाता था - ‘शैतान बनना आसान है, पर क्या इंसान बने रहना इतना मुश्किल है?’ तब मैं छोटा था. उस वाक्य का अर्थ पूरी तरह समझ नहीं पाता था, लेकिन वह मन में कहीं बैठ गया. जैसे कोई बीज चुपचाप मिट्टी के भीतर दबा हो और सही वक्त पर अंकुरित होने का इंतजार कर रहा हो. केरल की एक खबर ने उसी बीज को फिर से जगा दिया.


यह कहानी है 10 महीने की एक मासूम बच्ची- एलिन शेरिन अब्राहम की. इतनी सी उम्र, जब दुनिया का मतलब सिर्फ मां की गोद, पिता की उंगली और खिलौनों की मुस्कान तक सीमित होता है. लेकिन नियति को शायद कुछ और ही मंजूर था. एक सड़क हादसे ने उस नन्ही जिंदगी को हमसे छीन लिया. डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया. यह वह क्षण होता है जब समय ठहर जाता है. जब सांसें चल रही होती हैं, पर उम्मीद मर चुकी होती है. जब मशीनें शरीर को जिंदा रखती हैं, लेकिन दिल जानता है कि अब वापसी नहीं होगी. किसी भी मां-बाप के लिए यह असहनीय पीड़ा है. शब्द इस दर्द को बयान नहीं कर सकते. लेकिन यहीं से शुरू होती है असली इंसानियत की कहानी...

एलिन के माता-पिता -अरुण अब्राहम और शेरिन एन जॉन ने जो फैसला लिया, वह सामान्य नहीं था. उन्होंने अपने दुख को सीने में दबाकर तय किया कि उनकी बेटी की आखिरी विदाई किसी और के जीवन की शुरुआत बनेगी. एलिन का लिवर, दोनों किडनी, हार्ट वाल्व और आंखें दान कर दी गईं. पांच लोगों को नया जीवन मिलेगा. सोचिए, जिस घर में मातम था, उसी घर से पांच परिवारों के लिए उम्मीद की किरण निकली.

मैं अक्सर सोचता हूं - आखिर ऐसे लोग कहां से आते हैं? यह ताकत उन्हें मिलती कहां से है? जब आपका अपना खून, आपकी अपनी संतान आपसे छिन जाए, तब इंसान टूट जाता है. वह दुनिया से सवाल करता है, किस्मत को कोसता है, ईश्वर से नाराज हो जाता है. लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो अपने दर्द से ऊपर उठ जाते हैं. वे अपने आंसुओं को रोककर किसी और की मुस्कान की वजह बन जाते हैं.


क्या यही इंसानियत नहीं है?

हमारे समाज में अंगदान को लेकर अब भी कई भ्रम हैं. लोग डरते हैं. तरह-तरह की आशंकाएं होती हैं. कोई धार्मिक कारण बताता है, कोई सामाजिक दबाव का हवाला देता है. लेकिन सच यह है कि मौत के बाद शरीर मिट्टी में मिल जाता है. अगर वही शरीर किसी की सांस बन जाए, किसी की आंखों की रोशनी बन जाए, किसी बच्चे के सीने में फिर से धड़कन भर दे, तो इससे बड़ा पुण्य क्या हो सकता है?

एलिन अब इस दुनिया में नहीं है, लेकिन वह पांच लोगों के भीतर जिंदा रहेगी. एक छह महीने का बच्चा उसका लिवर पाकर नया जीवन पाएगा. कोई बच्चा उसकी किडनी से स्वस्थ भविष्य देखेगा. किसी के दिल में उसका हार्ट वाल्व धड़कता रहेगा. किसी की आंखों में उसकी रोशनी चमकेगी. यह सिर्फ चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धि नहीं है. यह मानवीय संवेदना की सबसे ऊंची मिसाल है. 

आज हम ऐसे समय में जी रहे हैं, जहां छोटी-छोटी बातों पर नफरत फैल जाती है. सोशल मीडिया पर शब्द हथियार बन जाते हैं. धर्म, जाति, भाषा के नाम पर दीवारें खड़ी कर दी जाती हैं. लोग एक-दूसरे को गिराने में लगे रहते हैं. ऐसे माहौल में एक 10 महीने की बच्ची हमें सिखा गई कि इंसानियत की कोई सीमा नहीं होती. दूरदर्शन के उस विज्ञापन की लाइन आज फिर मेरे कानों में गूंज रही है - ‘शैतान बनना आसान है, पर क्या इंसान बने रहना इतना मुश्किल है?’ अरुण और शेरिन ने यही किया. उन्होंने अपने जीवन के सबसे अंधेरे पल को पांच घरों की सुबह बना दिया. वे चाहते तो चुपचाप अपने दुख में डूब जाते. कोई उन्हें सवाल भी नहीं करता. लेकिन उन्होंने जो रास्ता चुना, वह आने वाली पीढ़ियों को सोचने पर मजबूर करेगा.<


- फहीम खान, सीनियर जर्नलिस्ट, नागपुर 
8483879505 

Comments

Popular posts from this blog

मकाऊची प्रेम-गल्ली: त्रावेसा दा पैशाओ

मोहब्बत… जो खत्म नहीं होती

स्वप्ननगरी मकाऊ