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कांचन येले – जैसा यार, वैसी ही अनोखी कहानी

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- फहीम खान कांचन येले… नाम सुनते ही चेहरे पर मुस्कान आ जाती है। वजह साफ़ है — ये शख्सियत ही कुछ अलग है। पिताजी फौज से रिटायर्ड, लेकिन कांचन हमेशा से मनमौजी मिज़ाज के रहे। हंसमुख इतना कि कॉलेज में हर किसी के दिल में जगह बना ली थी। आईटीआई से इलेक्ट्रिशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब साहब नागभिड़ के कॉलेज में मराठी साहित्य पढ़ने पहुंचे, तो जेब में हमेशा एक छोटा एफएम रेडियो साथ होता। गाने सुनना और गाना — दोनों ही शौक के साथ निभाते थे, और खुदा ने गला भी कमाल का दिया था। लेकिन असली पहचान तो उस आदत से बनी, जिससे सब परेशान भी रहते और हैरान भी — हर इलेक्ट्रॉनिक चीज़ को खोलकर उसका 'पोस्टमार्टम' करना। यही आदत बाद में हुनर बनी और साहब गुवाहाटी, गुजरात, मुंबई होते हुए नागपुर के ले मेरेडियन होटल तक पहुंच गए। बीच में हल्दीराम और सयाजी जैसे नामी होटलों का भी हिस्सा बने। आज मेहनत और हुनर के दम पर जिंदगी को सजाने-संवारने में लगे हैं। कांचन की सबसे बड़ी खासियत यही है कि खुद चाहे कितने ही दर्द क्यों न झेल रहे हों, दूसरों को हमेशा हंसाते रहे। कॉलेज के दिनों में जब क्लास बंक करते, तो सबको पता...