क्यों खाली हाथ लौट रही है पुलिस?

एसबीएल विस्फोट: डेढ़ महीने बाद भी न्याय दूर


- फहीम खान

डेढ़ महीना बीत चुका है. धूल बैठ गई है, फैक्ट्री की जली हुई दीवारें अब खामोश हैं, लेकिन 26 मजदूरों की मौत का सवाल अब भी हवा में तैर रहा है—आखिर न्याय कब मिलेगा? एसबीएल एनर्जी लिमिटेड में हुए भीषण विस्फोट के बाद से पुलिस लगातार दबिश दे रही है. रायपुर, नागपुर और महाराष्ट्र-छत्तीसगढ़ बॉर्डर पर तीन टीमें सक्रिय हैं. हर बार उम्मीद के साथ छापेमारी होती है, लेकिन नतीजा वही, खाली हाथ वापसी.


कंपनी के मालिक संजय चौधरी और सीईओ आलोक चौधरी अब भी गिरफ्त से बाहर हैं. उनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी हो चुका है, गैर-जमानती वारंट की प्रक्रिया भी चल रही है. पुलिस अब उन्हें “प्रोक्त अपराधी” घोषित करने की तैयारी में है, ताकि संपत्तियों को कुर्क किया जा सके.

जांच में यह आशंका भी है कि दोनों देश छोड़ने की कोशिश में हैं, या शायद जा चुके हैं. पहले भी शहर के एक आरटीआई कार्यकर्ता लुकआउट नोटिस के बावजूद दुबई भागने में सफल रहा था. इसी वजह से इस बार बॉर्डर एजेंसियों को अलर्ट किया गया है और पुराने ट्रैवल रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं.


सबसे बड़ा सवाल यही है, जब 11 लोग गिरफ्तार हो चुके हैं, कई निदेशकों की जमानत खारिज हो चुकी है, तो मुख्य जिम्मेदार अब तक फरार कैसे हैं? क्या सिस्टम की पकड़ कमजोर है, या फिर रसूख का असर अब भी कानून से बड़ा है?


हलफनामे ने खोली लापरवाही की परतें

मामले की जांच जब अदालत तक पहुंची, तो तस्वीर और भी डरावनी हो गई. बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ में दाखिल हलफनामे में कंपनी की गंभीर लापरवाहियां सामने आईं.

- फैक्ट्री में फायर सेफ्टी के बुनियादी इंतजाम तक नहीं थे

- फायर ट्रेलर पंप जैसी जरूरी व्यवस्था नदारद थी

- 26 अप्रैल 2025 के पुराने विस्फोट से कोई सबक नहीं लिया गया

- तैयार विस्फोटकों को सुरक्षित स्थान पर नहीं रखा गया

- जोखिम का आकलन ही नहीं किया गया

- 809 कर्मचारियों के लिए सिर्फ एक एंबुलेंस

- मेडिकल ऑफिसर नहीं, सीसीटीवी नहीं

- अकुशल मजदूरों से बिना प्रशिक्षण काम

- हलफनामे में साफ कहा गया, यह हादसा नहीं, लापरवाही की सीधी परिणति थी.



सवाल जो अब जवाब मांगते हैं

यह मामला अब सिर्फ एक फैक्ट्री ब्लास्ट नहीं रहा. यह सिस्टम की परीक्षा बन चुका है.

- क्या जांच एजेंसियों में तालमेल की कमी है?

- क्या पैसे और प्रभाव ने कानून की रफ्तार धीमी कर दी है?

- या फिर फरारी की स्क्रिप्ट पहले से लिखी जा चुकी थी?


26 मौतें सिर्फ आंकड़ा नहीं हैं. हर संख्या के पीछे एक घर उजड़ा है, एक सपना टूटा है. और जब तक असली जिम्मेदार सलाखों के पीछे नहीं पहुंचते, तब तक यह सवाल बार-बार उठता रहेगा, क्या इस देश में गरीब की मौत का न्याय भी इतना मुश्किल है?


- फहीम खान, सीनियर जर्नलिस्ट, नागपुर 
8483879505 

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