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कहां गई स्मार्टनेस?

कहां गई स्मार्टनेस? -आरसी के नाम पर दे रहे कम्प्यूटर प्रिंटआउट - मामला आरटीओ विभाग का - दिन-ब-दिन बदतर हो रहे हालात फहीम खान, 8483879505 इन दिनों शहर को हर मामले में ‘स्मार्ट’ बनाने की कवायद जारी है. लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि कोई पहले ‘स्मार्ट’ हुआ करता था, लेकिन अब नहीं है. ऐसा आमतौर पर होता नहीं है. लोग अपने आप में सुधार की कोशिश करते हुए आगे बढ़ते हैं लेकिन शहर का एक विभाग ऐसा है, जो पहले तो अपने कामों में ‘स्मार्ट’ था लेकिन अब उसकी स्मार्टनेस खो चुकी है. पेश है मेट्रो एक्सप्रेस की रिपोर्ट. ---- अपनी स्मार्टनेस को खोने वाला यह विभाग है-उपप्रादेशिक परिवहन विभाग यानी आरटीओ. यह ऐसा पहला विभाग है जहां पर ‘स्मार्ट’ की संकल्पना को सबसे पहली मर्तबा लागू किया गया था. योजनाएं शुरू भी हुर्इं लेकिन इसके बाद ऐसी गायब हुई कि अब उनका कुछ अता पता ही नहीं है. इसके चलते नागरिकों की इस विभाग से जुड़ी शिकायतें भी तेजी से बढ़ने लगी हैं. ---- कहां गए स्मार्ट कार्ड? आरटीओ की ओर से कुछ वर्ष पूर्व तक स्मार्ट कार्ड योजना चल रही थी. इसके तहत गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट (आरसी) को स्मार्ट कार्ड में ...

स्वच्छता सूची में पिछड़ने का कोई मलाल नहीं अफसरों को

स्वच्छता सूची में पिछड़ने का कोई मलाल नहीं अफसरों को - सिटी क्लीन करने की नहीं फिक्र - टूटे-फूटे डस्टबिन से फैल रही गंदगी फहीम खान, 8483879505 इस शहर को क्लीन सिटी बनाने के लिए कुछ वर्ष पहले स्थानीय प्रशासन ने लाखों रुपए खर्च कर विभिन्न इलाकों के प्रमुख मार्गों पर डस्टबिन लगाए थे. लेकिन इन डस्टबिन के रखरखाव की ओर प्रशासन ने कभी ध्यान नहीं दिया. जिसका नतीजा यह हो चुका है कि अब शहर के ज्यादातर इलाकों में लगाए गए ये डस्टबिन चोरी हो चुके हैं. कुछ जगह ये दिखाई भी देते हैं, तो सड़ चुके हैं. कहीं पर ये टूट चुके हैं और कूड़ा इधर-उधर बिखरने लगा है. असल में कई इलाकों में टूटे-फूटे डस्टबिन के कारण ही कूड़ा और गंदगी फैली नजर आ रही है. लगता है शहर में साफ-सफाई की व्यवस्था को लेकर तमाम सवाल उठने के बावजूद प्रशासन कानों में तेल डालकर बैठा है. पेश है मेट्रो एक्सप्रेस की रिपोर्ट. --- शहर के विभिन्न इलाकों में कुछ साल पहले स्थानीय प्रशासन की ओर से डस्टबिन लगाए गए थे. हाल के दिनों में भी कई इलाकों में नए सिरे से डस्टबिन लगाए गए थे. प्रमुख मार्ग और रिहायशी इलाकों में इन्हें लगाने के पीछे मंशा यह थी कि इसका ...

कब खत्म होंगे आॅफिस के चक्कर?

कब खत्म होंगे आॅफिस के चक्कर? - सरकारीतंत्र की गलती का खामियाजा भुगत रहे अभिभावक फहीम खान, 8483879505 सरकारी विभागों का निर्माण ही केवल इसलिए किया गया था कि आम नागरिकों को ज्यादा से ज्यादा सुविधाएं प्रदान की जा सकें. लेकिन इन दिनों सरकारी विभागों की लापरवाह कार्यप्रणाली के चलते नागरिकों की परेशानियां बढ़ती नजर आ रही हैं. ऐसा ही एक मामला ‘मेट्रो एक्सप्रेस’ की पड़ताल में सामने आया है. बच्चे के बर्थ सर्टिफिकेट पर लिखे नाम में गलती हो जाने का खामियाजा अब एक अभिभावक को भुगतना पड़ रहा है. सरकारी व्यवस्था की धीमी रफ्तार ने इन अभिभावकों की परेशानी और ज्यादा बढ़ा दी है. पेश है ‘एमई’ की रिपोर्ट. ---- शहर के दीपचंद्र मालवी अबतक अपनी जिंदगी बेहद ठीक तरीके से गुजार रहे थे. समय पर काम पर जाते थे और लौट कर आने के बाद परिवार के साथ समय बिताते. लेकिन पिछले कुछ महीनों से उनकी जिंदगी परेशानियों से घिर सी गई है. क्योंकि उनका ज्यादातर समय सरकारी आॅफिसों के चक्कर काटने में बीतने लगा है. एक आॅफिस से दूसरे आॅफिस उन्हें भेजा जाता है. नए-नए डॉक्यूमेंट्स मंगवाए जाते है. लेकिन सबकुछ करने के बाद भी उनकी मूल समस्या अ...

‘टाइगर कैपिटल’ में पड़ रहा सूखा!

‘टाइगर कैपिटल’ में पड़ रहा सूखा! -चंद महीनों में सौंदर्यीकरण की ऐसी-तैसी - आरटी रोड का मामला फहीम खान कुछ ही महीनों पहले शहर के रवींद्रनाथ टैगोर रोड पर टाइगर की प्रतिमाएं लगाई गई थीं. इन प्रतिमाओं के पास ‘नागपुर-द टाइगर कैपिटल आॅफ इंडिया’ लिखा गया था. इस माध्यम से टाइगर बचाने की मुहिम को रफ्तार देने की कोशिश भी वन विभाग द्वारा की गई थी. लेकिन चंद महीनों के भीतर ही ये सारा सौंदर्यीकरण बर्बाद हो गया. सौंदर्यीकरण के लिए जिन पौधों को लगाया गया था, देखरेख के अभाव में, वे सारे सूख गए हैं. लेकिन किसी भी विभाग का अब इस ओर ध्यान नहीं है. पेश है मेट्रो एक्सप्रेस की रिपोर्ट. ---- इन दिनों हर विभाग अपने-अपने स्तर पर इस शहर को बदलने की कोशिश में लगा है. इसी के तहत महानगर पालिका और एनआईटी प्रशासन ‘स्मार्ट सिटी’, ‘ग्रीन सिटी’ की मुहिम पर जोर दे रहे हैं. वहीं वन विभाग की ओर से ‘टाइगर कैपिटल’ का प्रचार जोरों पर जारी है. इसी के तहत पिछले दिनों वन मंत्री के हाथों आरटी रोड पर सौंदर्यीकरण कराकर उसका लोकार्पण किया गया था. उस समय ये सौंदर्यीकरण सभी के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया था. उल्लेखनीय है कि यह जगह स...

अब मैरिज सर्टिफिकेट का चक्कर

अब मैरिज सर्टिफिकेट का चक्कर - मामला बच्चों के सरनेम में गड़बड़ी का - कम नहीं हो रही अभिभावकों की परेशानी ------ फहीम खान सरकारी तंत्र को आॅनलाइन कर दिए जाने के बाद भी किस तरह नियमों में उलझाकर मामलों को जटिल कर दिया गया है, इसका जीता जागता उदाहरण बन है एक अभिभावक का अपने बच्चों के बदले हुए सरनेम को ठीक कराने की जद्दोजेहद का मामला. अबतक कई तरह के दस्तावेजों को उपलब्ध कराने के लिए ये अभिभावक सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाते रहे और अब मामला इस बात पर आकर रुका है कि नाम तभी बदलेगा जब अभिभावकों का मैरिज सर्टिफिकेट पेश किया जाएगा और ज्यादातर दंपतियों की तरह इनके पास भी यह मौजूद नहीं है. बच्चे के बर्थ सर्टिफिकेट पर नाम में गलती की गंभीरता को देरी से समझना कितना महंगा साबित हो सकता है, आइए हम आपको बताते हैं. सरकारी व्यवस्था की धीमी रफ्तार ने न सिर्फ इन अभिभावकों की परेशानी को बढ़ा दिया है बल्कि शहर के उन तमाम अभिभावकों के लिए एक सबक भी बन गया है कि उन्हें सरकारी दस्तावेजों के मामले में ज्यादा गंभीर होने की जरूरत है. शहर के दीपचंद्र मालवी अपने दोनों बेटों के सरनेम बदलने के लिए सरकारी कार्यालय...

15 लाख का घोटाला भूल गया एनआईटी?

15 लाख का घोटाला भूल गया एनआईटी? - सूख चुके हैं 56 खजूर के पेड़ - ‘सरकार’ को खुश करने लगाए थे फहीम खान मुंबई से शहर में आ रही ‘सरकार’ को खुश करने के लिए दो साल पहले शीतसत्र के दौरान लगाए गए वो 56 पेड़ पूरी तरह सूख कर अब गायब भी हो चुके हैं. इस प्लांटेशन पर नागपुर सुधार प्रन्यास (एनआईटी) प्रशासन ने 15 लाख रुपए सरकारी तिजोरी से लुटा दिए. लेकिन लगता है कि एनआईटी प्रशासन इस मामले को अब भुला भी चुका है. तभी तो प्लांटेशन के एक अन्य मामले में गड़बड़ी के लिए अपने 7 कर्मियों को निलंबित करने और 25 अन्य को नोटिस थमाने वाले एनआईटी प्रशासन ने बड़ी ही चालाकी से ‘डेट-ट्री’ मामले की फाइल को छिपा दिया है. "15 लाख का था टेंडर उल्लेखनीय है कि शीतसत्र के दौरान सिर्फ ‘सरकार’ को दिखाने के लिए एनआईटी के तत्कालीन चेयरमैन श्याम वर्धने के दिमाग में  आइडिया आया और उन्होंने टेंडर जारी कर दिया. शहर की ही लोटस कंस्ट्रक्शन कंपनी को यह टेंडर 15 लाख की राशि पर दिया गया. जिसमें 5 लाख रुपए मेंटेनन्स की राशि है. 56 पेड़ों के लिए बतौर कीमत एनआईटी ने संबंधित कंपनी को 10 लाख रुपए तुरंत चुका दिए. यानी हर एक पेड़ की कीमत 1785...

गंगा जमुना पर जीएसटी की मार

गंगा जमुना पर जीएसटी की मार - सेक्स वर्कर्स हैं नाराज फहीम खान, 8483879505 1 जुलाई से लागू हुए गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) का असर विदर्भ का सबसे बड़ा रेडलाइट एरिया कहलाने वाले, नागपुर के ‘गंगा जमुना’ पर भी दिखने लगा है. जीएसटी काउंसिल ने कंडोम को तो टैक्स से अलग रखा है, लेकिन सैनेटरी पैड पर 18 फीसदी टैक्स लगाया है. इसके बाद से यहां रहने वाली सेक्स वर्कर्स पर महंगाई की मार पड़ने लगी है. उल्लेखनीय है कि इस इलाके में सरकार की ओर से फ्री या कम दामों में सैनिटरी पैड उपलब्ध कराने की कोई व्यवस्था नहीं होने से भी महिला यौन कर्मियों पर महंगाई की मार ज्यादा पड़ रही है. पेश है ‘मेट्रो एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट. शहर के ‘गंगा जमुना’ इलाके में हजारों की संख्या में महिला यौनकर्मी है. सरकार ने हाल में लागू किए गए जीएसटी के तहत सैनेटरी पैड पर 18 प्रतिशत टैक्स लगाया है. ऐसे में जिन-जिन रेडलाइट एरिया में महिला यौनकर्मियों को सस्ते रेट पर सैनेटरी पैड उपलब्ध कराए जाते हैं, वहां पर भी उन्हें जीएसटी के साथ इनको खरीदने पर महिलाओं को अब ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है. फ्री नहीं मिलते पैड जीएसटी काउंसिल ने कंड...